(2)लग्नेश___लग्नेश मंगल षष्ठ स्थान मै राहु केतु अक्ष में बैठकर गंभीर रोग का संकेत देता है।
(3) षष्ठ भाव या श्ष्ठेश___लग्नेश का षष्ठस्थ होना ,षष्ठेश का नीचस्थ होकर व्यय भाव मै बैठकर लग्नेश को देखना तथा पचमेश षष्ठेश की व्यय भाव में युति तथा शनि की दृष्टि बुद्धि विकार का संकेत देती है ।
(4)चंद्रमा___चतुर्थेश होकर सप्तम भाव में शत्रु क्षेत्री है ।व्ययेश गुरु तथा बाधकेश शनि की ,चंद्रमा पर दृष्टि मानसिक रोग की पुष्टि कर रही है
निष्कर्ष_____ चतुर्थ भाव मन की कोमल भावनाओं को दर्शाता है उस पर शनि व केतु की दृष्टि ने में को पीड़ीत किया ।पंचमेश का व्यय भाव में षष्ठेश से युति करना मस्तिष्क विकार की पुष्टि करता है।लग्नेश का राहु से पीड़ीत होकर षष्ठस्थ होना भी पागलपन को दर्शा रहा है ।
सदगुरु कृपा ज्योतिष केंद्र
कुंडली विशेषज्ञ _Astroplus Durvesh kumar
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