Tuesday, March 31, 2020

कुछ महत्त्वपूर्ण योग ज्योतिष मे--

1-यदि जन्म  का स्वामी 6,8,12 भाव के स्वामी के साथ जन्म मे हो और उस पर क्रुर ग्रह की द्रष्टि या युति हो तो उसका  स्वस्थ ठीक नही रहेगा ।यदि उस  पर किसी  सौम्य  ग्रह की द्रष्टि  हो तो इस अनिष्ट की भविष्यवाणी  नही करनी चाहिये।
2--यदि लग्नाधिपति  लग्न मे हो और क्रुर ग्रह की युक्ति हो तो जातक शारीरिक  रूप से सुखी नही होगा।
3--यदि स्वामी प्रबल हो,उत्तम ग्रह केंद्र मे पड़े  हो और लग्न मे अनिष्ट ग्रहो की द्रष्टि ना हो तो शरीर से काफी सुखी  रह्ता है।
4--यदि लग्न के स्वामी के साथ अनिष्ट ग्रह की युक्ति हो और राहु लग्न मे हो तो उस  जातक के साथ कपट होता है ।

         सद्गुरु कृपा ज्योतिष केंद्र
कुंडली  विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar

Monday, March 30, 2020

प्रश्न के अनुसार ससुराल की दूरी कितनी होगी---

1-- सप्तम भाव मे चर राशि(1,4,7,10)या सप्तम भाव मे शीघ्र गामी  ग्रहो  का प्रभाव दूर देश में  विवाह कराता  है  ।यानी लगभग 300 किलोमीटर  दूरी ।
2--सप्तम भाव मे स्थिर राशि (2,5,8,11) होने से ससुराल 100 किमी  से भी कम  दूरी पर होती है ।
3--सप्तम भाव मे द्विस्वभाव  राशि (3,6,9,12) होने से ससुराल लगभग 150-200किमी  दूर होती हैं ।

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar 

Saturday, March 28, 2020

कुंडली मे नीच ग्रह---

कुंडली में जब कोई ग्रह नीच राशि का होता है तब आम तौर पर यह समझ लिया जाता है कि यह ग्रह अवश्य फल अशुभ फल देगा। परंतु वास्तविकता कुछ और है, आईये देखें कुंडली में नीच ग्रह का अवलोकन कैसे करे :-

किसी भी ग्रह के नीच राशि में होने से अभिप्राय उसके बलहीन होने से है, न की उसके शुभ अशुभ होने से। बलहीन से अभिप्राय है की, ग्रह की फल देने की जो क्षमता होती है, उसमे कमी आ जाती है, ऐसे में ये ग्रह जातक को अपना पूर्ण फल नही दे पाता है।

इसे इस प्रकार समझें:- हर ग्रह किसी न किसी राशि में किसी विशेष अंश पर परम नीच होता है, जिसका अभिप्राय है की इस अंश पर ग्रह का बल बिलकुल न्यून होगा, और वो जैसे-जैसे उस अंश से आगे बढ़ता जाएगा उसका बल बढ़ता जाएगा और उसकी फल देने की क्षमता भी बढती जायेगी।

कोई ग्रह किसी राशि विशेष में ही नीच क्यों होता है, उसके पीछे कोई न कोई ज्योतिषीय कारण अवश्य होता है, जिसकी आगे के किसी लेख में विस्तार से चर्चा करूंगा, जैसे की मंगल अपने मित्र चन्द्र की राशि में नीच क्यों है, इसके पीछे ये कारण है की मंगल अग्नि तत्व ग्रह है, और कर्क राशि जल तत्व राशि है, ऐसे में यहाँ मंगल की ताकत कम हो जाती है। इसका दूसरा कारण है की, मंगल को सेनापति का दर्जा ज्योतिष में प्राप्त है, तो चन्द्रमा को रानी का, और जैसे की आप जानते है की रानी के सामने कोई भी सेनापति अपने को असहाय महसूस करता है, क्योंकि वो अपने बल का प्रयोग नही कर सकता।

अक्सर नीच के ग्रह के बुरे फल जातक को मिलते हैं ऐसा माना जाता है। इसका कारण ये है की, जब कोई ग्रह नीच की राशि में हो तो, उसका बल काफी कम हो जाता है, जिससे वे अपना शुभ फल जातक को दे ही नही पाता है, लेकिन मेरा ये मानना है की हमें किसी ग्रह को केवल नीच की राशि में देखते ही उसके बुरे फल के बारे में नही घोषणा करनी चाहिए। कुछ ऐसी परिस्थितियां होती हैं जिसमे नीच का ग्रह भी हमको शुभ फल दे सकता है,  विद्यार्थीयों को एक खास बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए की ग्रह के नीच होने पर उसके बुरे फल ही नहीं गिनने चाहिए। अर्थात् हमें ये बात हमेशा याद रखनी चाहिए की ग्रह के नीच या उच्च होने से उसके शुभ अशुभ होने का कोई कारण न होकर उसके बली होने या न होने से होता है। यदि कोई भी ग्रह नीच राशि में है तो इसका ये मतलब होगा की उस ग्रह में उसके कारक तत्वों की कमी होगी, और वो ग्रह जिन तत्वों का कारक है, और कुंडली में जिन भावों का स्वामी है उनसे सम्बन्धित पूर्ण फल नही दे पायेगा। परंतु ऐसा तब माना जायेगा जब नीच राशि में स्थित ग्रह का नीच भंग नहीं हो रहा हो।

दूसरा पहलू यह भी है कि – मान लीजिये की व्यय भाव का मालिक नीच का है, तो ये एक तरह से जातक के लिय अच्छा होगा, क्योंकि जातक के व्यर्थ के खर्च आदि में कमी हो जायेगी।

किसी भी नीच राशि में स्थित ग्रह के फल को देखने के लिए सबसे पहले तो हमें ये देखना होगा की ग्रह का नीच भंग हो रहा है या नही? नीच भंग के लिय ये माना जाता है की यदि कोई ग्रह किसी राशि में नीच का है, और उस राशि का स्वामी उस ग्रह के साथ हो, या उस ग्रह को अपनी पूर्ण दृष्टी से देखता हो, या बलि होकर केंद्र में हो तो, उस ग्रह का नीच भंग हो जाता है। जैसे कि  वृश्चिक के चन्द्रमा के साथ मंगल हो या मंगल की पूर्ण दृष्टी चन्द्र पर हो, या मंगल स्वराशी या उच्चराशि में केंद्र में हो, साथ ही यदि किसी नीच के ग्रह के साथ उंच का ग्रह हो, तो भी नीच भंग हो जाता है। जैसे मकर राशि के गुरु के साथ ही मकर में ही मंगल हो। इसके साथ ही यदि कोई ग्रह लग्न कुंडली में तो नीच का हो, लेकिन नवमांश में उच्च का हो तो, उसका भी नीच भंग हो जाता है।

अब देखना चाहिए कि कोई ग्रह की नीचता भंग नही हो रही हो, तो उसका फल हम कैसा मिलेगा?- उसके लिये सबसे पहले तो हम देखेंगे की उस नीच के ग्रह की राशि के स्वामी की स्थिति कैसी है ? यदि उसकी स्थिति अच्छी है, तो उस नीच के ग्रह के अशुभ फल में कमी होगी।

इसके साथ ग्रह के फल इस बात पर भी निर्भर करते हैं की नीच का ग्रह किस नक्षत्र में है? जैसे की हम चन्द्रमा को लेते हैं- चन्द्रमा हमारी कुंडली में मन का कारक होता है, चन्द्रमा यदि नीच है और नीच भंग नहीं हो रहा, तो जातक दिल का कमजोर होता है, बहुत जल्दी व्यथित होने वाला होता है, लेकिन मुख्य प्रभाव इस बात का है की चन्द्रमा किस नक्षत्र में है। वृश्चिक राशि में तीन नक्षत्र आते हैं, 1. विशाखा, 2. अनुराधा, और 3. ज्येष्ठा। अब विशाखा नक्षत्र में यदि चन्द्र होगा तो उसके बुरे फल काफी कम होंगे, क्योंकि इस नक्षत्र का स्वामी गुरु है जो कि चन्द्रमा का मित्र ग्रह है। जातक के मन पर गुरु का प्रभाव होगा, और यदि गुरु का साथ किसी भी प्रकार से चन्द्रमा को मिला तो चन्द्रमा नीच का होते हुए भी बुरे फल नही देगा। दूसरा नक्षत्र अनुराधा होता है, और जिसका स्वामी शनि देव होते हैं, और शनि देव को उदासी वैराग्य का कारक माना जाता है, ऐसे में जातक पर नीच के चन्द्रमा का पूरा फल मिलेगा, जिस से जातक के मन पर हर समय एक प्रकार की भारी जिम्मेदारी छाई रहती है, जातक ख़ुशी के माहोल को भी अच्छी तरह इंजॉय नही कर पाता। तीसरा नक्षत्र ज्येष्ठा है, जिसका स्वामी बुध है। अब हमें देखना होगा की बुध का पंचधा मैत्री चक्र के अनुसार चन्द्रमा से कैसा सम्बन्ध बन रहा है? और बुध की कुंडली में क्या स्थिति है। बुध का जातक के मन पर पूर्ण प्रभाव होगा, और यदि बुध कुंडली में अशुभ फल देने वाला हुआ जैसे की मेष लग्न में होता है, तो जातक को नीच के चन्द्रमा के पूर्ण अशुभ फल मिलेंगे।

इस प्रकार कोई भी ग्रह किस नक्षत्र में है, और उसके स्वामी की स्थिति क्या है? उसका पूर्ण प्रभाव जातक पर पड़ता है। जैसे सूर्य जो की हमारी आत्मा का कारक होता है, और तुला राशि में नीच का होता है, तुला में सूर्य उतने बुरे फल विशाखा नक्षत्र में नही देगा जितने बुरे फल स्वाति नक्षत्र में देगा, क्योंकि विशाखा नक्षत्र का स्वामी गुरु है, तो स्वाति का स्वामी राहू होता है। ऐसे में जातक की आत्मा पर राहू का पूर्ण दुष्प्रभाव होगा।

नीच राशि स्थित ग्रह का प्रभाव कैसे होगा? उसे हम इस प्रकार समझ सकते है :- कोई भी ग्रह नीच का होने से उसके जो कारक तत्व हैं, उनकी शरीर में कमी होगी जैसे मंगल हिम्मत और साहस बाहुबल का कारक ग्रह है, और वो कुंडली में नीच का हो गया तो, मंगल जो की हिम्मत और हौसले का कारक है, उसकी जातक में कमी होगी, या फिर जातक अपनी ताकत और हिम्मत का प्रयोग निर्बल लोगों को सताने में करेगा। अब चूँकि मंगल भाई का भी कारक है तो, जातक के भाइयों को भी समस्या देगा, या भाई से सुख जातक का कम कर देगा।

       सद्गुरु कृपा ज्योतिष केन्द्र 

कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh Kumar

Friday, March 27, 2020

वक्री ग्रह क्या होते है और उनके फल--


वक्री ग्रह क्या होते हैं? सूर्य और चन्द्र को छोड़कर सभी ग्रह वक्री होते हैं। वक्री अर्थात किसी राशि में उल्टी दिशा में गति करने लगते हैं। वस्तुतः कोई भी ग्रह कभी भी पीछे की ओर नहीं चलता भ्रम मात्र है। घूमती हुई पृथ्वी से ग्रह की दूरी तथा पृथ्वी और उस ग्रह की अपनी गति के अंतर के कारण ग्रहों का उलटा चलना प्रतीत होता है। किंतु ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जन्म कालीन समय पर ग्रहों की ऐसी उलटी गति के कारण उनका प्रभाव जीवन पर उनकी सामान्य गति से अलग होता है।

 

ज्योतिष में वक्री ग्रह के फल के बारे में अलग-अलग मत है। सभी के मतों को पढ़ने के बाद छह तरह के मत प्रकट होते हैं। हम यहां छटवें मत की चर्चा करेंगे।

 

पहला मत- जब ये वक्री होते हैं, तब इनकी दृष्टि का प्रभाव अलग-अलग होता है। वक्री ग्रह अपनी उच्च राशिगत होने के समतुल्य फल प्रदान करता है। कोई ग्रह जो वक्री ग्रह से संयुक्त हो, उसके प्रभाव में मध्यम स्तर की वृद्धि होती है। उच्च राशिगत कोई ग्रह वक्री हो, तो नीच राशिगत होने का फल प्रदान करता है।

 

इसी प्रकार से जब कोई नीच राशिगत ग्रह वक्री होता जाए, तो अपनी उच्च राशि में स्थित होने का फल प्रदान करता है। इसी प्रकार यदि कोई उच्च राशिगत ग्रह नवांश में नीच राशिगत होने, तो नीच राशि का फल प्रदान करेगा। कोई शुभ अथवा पाप ग्रह यदि नीच राशिगत हो, परंतु नवांश में अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो वह उच्च राशि का ही फल प्रदान करता है।

 

दूसरा मत- वक्री ग्रह किसी भी कुंडली में सदा अशुभ फल ही प्रदान करते हैं क्योंकि वक्री ग्रह उल्टी दिशा में चलते हैं इसलिए उनके फल अशुभ ही होंगे। 

 

तीसरा मत- कोई भी ग्रह यदि वक्री हो रहा है तो वह प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली के हिसाब से ही शुभ या अशुभ फल देगा। उदारणार्थ गुरु के वक्री होने पर उसके शुभ या अशुभ फल देने के प्रभाव में कोई अंतर नहीं आता अर्थात किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाले गुरु वक्री होने की स्थिति में भी उस कुंडली में शुभ फल ही प्रदान करेंगे तथा किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाले गुरु वक्री होने की स्थिति में भी उस कुंडली में अशुभ फल ही प्रदान करेंगे। हां, वक्री होने से गुरु के व्यवहार जरूर बदलाव आता है जैसे वक्री होने की स्थिति में गुरु कई बार शुभ या अशुभ फल देने में देरी कर देते हैं।.. यही नियम अन्य ग्रहों पर भी लागू होते हैं। 

 

चौथा मत- वक्री ग्रह किसी कुंडली विशेष में अपने कुदरती स्वभाव से विपरीत आचरण करते हैं अर्थात अगर कोई ग्रह किसी कुंडली में सामान्य रूप से शुभ फल दे रहा है तो वक्री होने की स्थिति में वह अशुभ फल देना शुरू कर देता है। इसी प्रकार अगर कोई ग्रह किसी कुंडली में सामान्य रूप से अशुभ फल दे रहा है तो वक्री होने की स्थिति में वह शुभ फल देना शुरू कर देता है।

 

पांचवां मत- इसके पश्चात यह धारणा भी प्रचचलित है कि वक्री ग्रहों के प्रभाव बिल्कुल सामान्य गति से चलने वाले ग्रहों की तरह ही होते हैं तथा उनमें कुछ भी अंतर नहीं आता। ज्योतिषियों के इस वर्ग का यह मानना है कि प्रत्येक ग्रह केवल सामान्य दिशा में ही भ्रमण करता है तथा कोई भी ग्रह सामान्य से उल्टी दिशा में भ्रमण करने में सक्षम नहीं होता।
 

 

वक्री ग्रह की दृष्टि का छठा मत- 

ज्योतिषियों का एक वर्ग के अनुसार अगर कोई ग्रह अपनी उच्च की राशि में स्थित होने पर वक्री हो जाता है तो उसके फल अशुभ हो जाते हैं तथा यदि कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में वक्री हो जाता है तो उसके फल शुभ हो जाते हैं।

 

सूर्य : यह ग्रह मेष में उच्च का और तुला में नीच का होता है। लेकिन यह वक्री नहीं होता है।

चंद्र : यह ग्रह वृषभ में उच्च का और वृश्चिक में नीच का होता है। लेकिन यह वक्री नहीं होता है।
 

 

1.मंगल- मंगल की दो राशियां है- पहली मेष और दूसरी वृश्चिक। यह ग्रह मकर राशि में उच्च का और कर्क राशि में नीच का होता है। जब मंगल वक्री होता है तो स्वा‍भाविक रूप से मकर राशि वालों के लिए सकारात्मक और कर्क राशि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है। मतलब यह कि उच्च राशि पर अच्छा, नीच राशि पर बुरा और सम राशि पर मिलाजुला असर रहता है। लेकिन मंगल जब अन्य राशियों में भ्रमण करता है तो उसका इस राशि वालों लोगों के लिए फल अलग होता है। यही बात सभी राशियों पर लागू होती है।
 

 

2.बुध- बुध ग्रह की दो राशियां हैं- पहली मिथुन और दूसरी कन्या। यह ग्रह कन्या में उच्च का और मीन में नीच का होता है। जब बुध वक्री होता है तो स्वा‍भाविक रूप से कन्या राशि वालों के लिए सकारात्मक और मीन रा‍शि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है। लेकिन बुध जब अन्य राशियों में भ्रमण करता है तो उसका इस राशि वालों लोगों के लिए फल अलग होता है।

 

3.बृहस्पति- इस ग्रह की दो राशियां हैं- पहली धनु और दूसरी मीन। यह ग्रह कर्क में उच्च का और मकर में नीच का होता है। जब बृहस्पति ग्रह वक्री होता है तो स्वा‍भाविक रूप से कर्क राशि वालों के लिए सकारात्मक और मकर राशि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है। लेकिन बृहस्पति जब अन्य राशियों में भ्रमण करता है तो उसका इस राशि वालों लोगों के लिए फल अलग होता है।
 

 

4.शुक्र ग्रह- इस ग्रह की दो राशियां हैं- पहली वृषभ और दूसरी तुला। यह ग्रह मीन राशि में में उच्च और कन्या ‍राशि में नीच का होता है। जब यह ग्रह वक्री होता है तो स्वा‍भाविक रूप से मीन राशि वालों के लिए सकारात्मक और कन्या राशि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है। लेकिन शुक्र जब अन्य राशियों में भ्रमण करता है तो उसका इस राशि वालों लोगों के लिए फल अलग होता है।
 

 

5.शनि- इस ग्रह की दो राशियां है- पहली कुंभ और दूसरी मकर। यह ग्रह तुला में उच्च और मेष में नीच का होता है। जब यह ग्रह वक्री होता है तो स्वाभाविक रूप से तुला राशि वालों के लिए सकारात्मक और मेष राशि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है। लेकिन शनि जब अन्य राशियों में भ्रम करता है तो उसका अलग असर होता है। यदि वह मेष की मित्र राशि धनु में भ्रमण कर रहा है तो मेष राशि वालों पर नकारात्मक असर नहीं डालेगा।
 

 

6.राहु- राहु मिथुन मतांतर से यह ग्रह वृषभ में उच्च का और वृश्चिक में नीच का होता है। जब यह ग्रह वक्री होता है तो स्वा‍भाविक रूप से वृषभ राशि वालों के लिए सकारात्मक और वृश्चिक राशि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है। लेकिन राहु जब अन्य राशियों में भ्रमण करता है तो उसका इस राशि वाले लोगों के लिए फल अलग होता है।

 

7.केतु- राहु मिथुन मतांतर से यह ग्रह वृश्चिक में उच्च का और वृषभ में नीच का होता है। जब यह ग्रह वक्री होता है तो स्वाभाविक रूप से वृश्चिक राशि वालों के लिए सकारात्मक और वृषभ राशि वालों के लिए नकारात्मक होता है। लेकिन केतु जब अन्य राशियों में भ्रमण करता है तो उसका इस राशि वाले लोगों के लिए फल अलग होता 

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh Kumar

Wednesday, March 25, 2020

प्रश्न के अनुसार भूमि या भवन की प्राप्ति कैसे होगी----

1--यदि लग्नेश षष्ट  भाव मे बुध की राशि मे स्थित होकर बुध से द्रष्टि युति सम्बंध करे तो  प्रशंकर्ता  मामा  या नाना  से भू सम्पदा  पाता  हैं ।
2--चतुर्थ  भाव की कुम्भ राशी मे लग्नेश मंगल पर सुर्य की द्रष्टि  बटवारे मे या पिता से भूमि की प्राप्ति होती है।
3---केंद्र  या त्रिकोण भाव मे चतुर्थेश  का (गुरु +शुक्र) से द्रष्टि युति सम्बंध अपने  परिश्रम या प्रयास से भूमि लाभ देता है ।
नोट---ज़मीन की खरीद मे लग्न खरीदार,चतुर्थ भाव भू संपदा ,सप्तम भाव विक्रेता तो दशम भाव सम्पत्ति  का मूल्य  होता है ।

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कुंडली विशेषज्ञ --Astroplus Durvesh kumar

Tuesday, March 24, 2020

शनि की साढ़े साती व ढैय्या----

शनि का बारह राशियो में  गोचर काल लगभग 29 वर्ष साढ़े  दस मास का होता है।यदि हम इस समय को 30 वर्ष समझे तो  शनि का एक राशि मे रहने  का समय लगभग 2½ वर्ष  होता है।जब जन्म राशि(जन्म समय चंद्रमा जिस राशि मे हो)से बारहवे  भाव मे शनि गोचर वश आता है तब साढ़े साती शुरु होती है तथा शनि के जन्म  राशि तथा उससे दूसरे  भाव से निकलकर तीसरे भाव मे आ जाने तक रहती  है। इस प्रकार शनि जन्म राशि सहित तीन राशियो(द्वादश, चंद्र लग्न और द्वितीय) मे 7½ वर्ष  मे भ्रमण  कर लेता है।

ढैय्या---- जब शनि जन्म राशि से चतुर्थ  और अष्टम  स्थान मे आता है तो  इस गोचर को छोटी साढ़े साती या  ढैय्या कहा जाता है।यह 2½ वर्ष  की होती है तथा इसका  फल भी शनि की साढ़ेसाती   जैसा ही होता है।यहा भी कारण शनि की लग्न तथा द्वितीय  भाव पर द्रष्टि ही है।।
"जिन लोगो की कुंडलियो मे  शनि बलवान,उच्च,स्व्गृही,मित्रगृही या योग कारक होता है,उन  लोगो को शनि की साढ़ेसाती  मे विशेष  कष्ट नही होता ।इसके  विपरीत निर्बल और शत्रु  क्षेत्री शनि वाली  कुंडलियो मे शनि साढ़ेसाती, ढैय्या आदि  अवधि  मे विशेष अनिष्टकारी रह्ता है "

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar

मंगल का गोचर फल---‐

मंगल चंद्र  लग्न से गोचरवश 3,6 और 11 वे भाव में  शुभ फल देता है ।शेष भाव मै इसका फल अशुभ बताया गया है।
चंद्र  लग्न मै यदि गोचर वश मंगल हो तो उस समय कार्य  सफल नही होते है ।
व्यक्ति  ज्वर,घाव और रक्त विकार से  कष्ट उठाता है ।
आग,ज्वर  और हथियार से शरीर कष्ट की सम्भावना  होती है ।बवासीर  आदि  रोगो से  पीडित  होना पड्ता है ।स्त्री को भी ज्वर  आदि से कष्ट होता है ।दुर्जनो से कष्ट मिलता  है ।यात्रा  मै दुर्घटनाएं  होती है ।अन्य  भी कई  प्रकार  के उपद्रव  होते है ।

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar

Sunday, March 22, 2020

प्रश्न के अनुसार क्या बस चलाने का परमिट मिलेगा----

1--लग्न--लग्नेश शनि की चंद्रमा  से युति पर शुभ ग्रह गुरु की द्रष्टि है तो लग्न,अपने स्वामी से द्रष्ट होने के कारण,बहुत शुभ और  बली है ।
2--लाभस्थान  मै दशमेश शुक्र है तो लाभेश मंगल की,  उच्चराशिस्थ भाग्येश  बुध तथा राजा या सरकार  के नैसर्गिक कारक  सुर्य के साथ भाग्यस्थान  मै युति है।पुन: लाभेश का लाभात लाभम  होना भी कार्य सिद्धि को दर्शाता है।
निष्कर्ष--इस प्रश्नकर्ता को 1 महीने के अन्दर  परमिट मिल गया था ।

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar 

Saturday, March 21, 2020

प्रश्न के अनुसार सामान की बिक्री कब होगी---

1--लाभेश उच्च्स्थ,स्व्छेत्रि या मित्रछेत्रि  हो कर लग्न या लग्नेश से सम्बंध करे ।

2--लाभेश या लाभ स्थान का द्रष्टि युति सम्बंध हो तो ऐसी परिस्तिथि  मै माल बेचना लाभदायक होता है ।

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar 

Friday, March 20, 2020

प्रश्न के अनुसार यात्रा मैं विघ्न है या नही --

1--पंचम,सप्तम् या नवम भाव मै पाप ग्रह हो  तथा लग्न व लग्नेश पाप पीडित हो।
2--लग्न या लग्नेश से नवम तथा द्वादश भाव पाप ग्रह पर पाप ग्रह की द्रष्टि युति हो।
3--चन्द्रमा पापकर्तरि योग बनाकर  नवमेश से द्रष्टि युति करे तथा व्ययेश पाप पीडित हो ।

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar 

Thursday, March 19, 2020

प्रश्न के अनुसार दुश्मन की विजय होगी या नही---

1--सप्तम भाव मै क्रुर ग्रह की उपस्तिथि तथा लग्न मै नीचराशिस्थ या अस्तगत  ग्रह होना शत्रु को विजय देता है।
2--च्तुर्थेश तथा सप्तमेश का द्रष्टि युति सम्बंध शत्रु की विजय कराता  है।

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कुंडली विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar

Wednesday, March 18, 2020

प्रश्न के अनुसार गर्भपात की स्थिति कब बनती है---

1--पंचम भाव मै पाप ग्रह की स्थिति या द्रष्टि तथा पंचमेश का दुस्थान मै बैठना गर्भ हानि  दे सकता  है ।
2-- प्रशं लग्न मै मंगल के साथ शनि  हो।
3--हीन  बली चन्द्रमा यदि मंगल,शनि से  द्रष्टि यति सम्बंध करे तथा शनि या मंगल  की राशि मैं  भी हो तो इसे गर्भपात  का संकेत  जाने।
4--यदि पंचमेश नीच राशि मै या पाप पीडित हो तो भी गर्भपात का संकेत जाने।
        
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कुंडली  विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar 

Monday, March 16, 2020

प्रश्न के अनुसार वर या वधु का स्वभाव कैसा होगा___

1--सप्तम भाव  का स्वामी यदि शुभ ग्रह  हो या शुभ ग्रह का सम्बंध सप्तम भाव या सप्तमेश से हो तो वर या वधु सौम्य स्वभाव की,कार्यकुशल,सुन्दर तथा गुणी  होती  है।
2--सप्तम भाव या सप्तमेश का सम्बंध पाप ग्रह से होने पर जीवन साथी व्यवहार  कुशल,चतुर,थोडा उग्र स्वभाव,सुख,लोलुप व अधिकार  प्रिय होता है।कोई जताक स्वार्थी,क्रुर व आक्रमक  स्वभाव का हटी  व्यक्ति होता है ।

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कुंडली  विशेषज्ञ--Astroplus Durvesh kumar 

Sunday, March 15, 2020

प्रश्न के अनुसार तलाक किस स्तिथि मै होता है_

1.सातवे स्थान में सूर्य हो तो पति द्वारा तलाक दिए जाने की संभावना रहती है।
2.सातवे स्थान में निर्बल पाप ग्रह हो और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो एक पति द्वारा तलाक दिया जाकर,दूसरे से विवाह करने की स्थिति अती है ।
3.सातवे स्थान में शुभ और पाप दोनों तरह के गृह योग हो तो पुनर्विवाह करने का योग होता है ।

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गोचर में सूर्य का फल___

यदि पंचमेश सूर्य निर्बल होकर व शनि तथा बुध के प्रभाव में होकर पंचम भाव में हो तो इस अवधि में मनुष्य को अपच रोग हो जाता है और स्मरण शक्ति भी कमजोर हो जाती है।यदि पाप प्रभाव अधिक हो तो पेट में अल्सर आदि असाध्य रोग होते है । राहु और शनि के प्रभाव में होकर पंचम में पंचमेश बार बार गर्भपात करवाता है।व्यक्ति को लाटरी , सट्टे आदि से सर्वदा हानि ही रहती है।जातक की पत्नी के बड़े भाई भी उसके विरूद्ध रहते है।
       
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Friday, March 13, 2020

प्रश्न उठता है कि ग्रहों को बली बनाने के लिए ,हवन या पूजन उचित है या नहीं __

ईश्वर व देवताओं का पूजन छोड़कर निर्जीव ग्रहों का पूजन कहीं मानवीय चिंतन,चेतना व विवेक का अपमान तो नहीं होगा ।सच तो ये है कि संसार उस एक रोशनी से जगमगा रहा है।चाहे किसी भी ढंग से करो पूजन परमात्मा का ही करता है चाहे किसी भी भाषा में करो ।
(1)महर्षि पाराशर ने कहा है कि यधपी अजन्मा भगवान वाशुदेव के अनेक अवतार है लेकिन सभी प्राणियों को कर्मफल देने वाले ग्रह रूप अवतार मुख्य है (पराशर होरा शास्त्र अवतार कथनाध्याए श्लोक 3)
सूर्य से राम ,चंद्रमा से कृष्ण ,मंगल से नृसिंह,बुध से गोतम बुद्ध ,गुरु से वामन,शुक्र से परशुराम,शनि से कच्छप,राहु से वाराह तथा केतु से मत्स्य के रूप में उस भगवान  के अवतार हुई है ( पाराशर होरा शास्त्र2:5व6)
अतः ग्रह पूजन मै निर्जीव ग्रह की पूजा उपासन नहीं है वरन् उस परम पिता ,सर्वशक्तिमान , सर्व नियंता की उपासना है जो ग्रहों का रूप धारण कर ,जीव को कर्मफल भोग कराता है  वास्तव में रोगों की आध्यात्मिक चिकित्सा है ।जिसमें ग्रहों के माध्यम से , उस ज्योति रूप परमात्मा से स्वास्थ्य ,सुख व समृद्धि की प्रार्थना की जाती है ।

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कुंडली विशेषज्ञ __Astroplus Durvesh kumar 

Thursday, March 12, 2020

मूर्छा रोग क्यों होता है इसके ज्योतिषीय कारण

(1) सूर्य+चंद्रमा+मंगल की युति लग्न या अष्टम भाव में हो तथा इस युति पर पाप ग्रह की दृष्टि हो।
(2) मंगल+शनि षष्ठ या अष्टम भाव में पाप दृष्ट हो।
(3) दु:स्थान में स्थित चंद्रमा की युति मंगल,शनि, राहु या केतु से हो।
(4) चंद्रमा +गुरु+शनि+राहु अष्टम भाव में हो ।
(5) चंद्रमा +शनि की युति पर मंगल की दृष्टि हो ।

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Wednesday, March 11, 2020

आखिर गूंगी बाहरी पुत्री क्यों होती है

(1)लग्न व लग्नेश__लग्न रही केतु अक्ष मै है ।अष्टमेश मंगल की लग्न व लग्नेश पर दृष्टि है।लग्नेश बुध पर राहू नियंत्रक बाधकेश गुरु की अशुभ दृष्टि अनिष्ट प्रद है ।
(2)द्वितीय भाव तथा द्वितीयेश__ द्वितीय भाव पर राहु युक्त अष्टमेश मंगल की दृष्टि है ।द्वितीयेश,पाप मध्यतव मै अष्टमस्थ है तथा बाधापती गुरु से दृष्ट है ।ये मूकत्व का संकेत देता है ।
(3)बुध__बुध पर रही युक्त अष्टमेश मंगल तथा राहु नियंत्रक गुरु की दृष्टि वाणी दोष का संकेत देती है ।
अर्थात द्वितीय भाव ,गुरु तथा बुध के पापत्व से ये बच्ची गूंगी बहरी है ।गुरु का पापत्व बहरापन देता है ।जल तत्व राशियां शनि,मंगल,राहु के कारण पापी हो गई।ये भी मूकता की पुष्टि करती है ।

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कुंडली विशेषज्ञ _Astroplus Durvesh kumar

Tuesday, March 10, 2020

आखिर पागलपन क्यों होता है

(1)लग्न ____ राहु युक्त अष्टमेश मंगल, षष्ठ भाव से लग्न को देखता है।शनि से दृष्ट चंद्रमा की लग्न पर दृष्टि भी लग्न को कमजोर करती है।
(2)लग्नेश___लग्नेश मंगल षष्ठ स्थान मै राहु केतु अक्ष में बैठकर गंभीर रोग का संकेत देता है।
(3) षष्ठ भाव या श्ष्ठेश___लग्नेश का षष्ठस्थ होना ,षष्ठेश का नीचस्थ होकर व्यय भाव मै बैठकर लग्नेश को देखना तथा पचमेश षष्ठेश की व्यय भाव में युति तथा शनि की दृष्टि बुद्धि विकार का संकेत देती है ।
(4)चंद्रमा___चतुर्थेश होकर सप्तम भाव में शत्रु क्षेत्री है ।व्ययेश गुरु तथा बाधकेश शनि की ,चंद्रमा पर दृष्टि मानसिक रोग की पुष्टि कर रही है 
निष्कर्ष_____ चतुर्थ भाव मन की कोमल भावनाओं को दर्शाता है उस पर शनि व केतु की दृष्टि ने में को पीड़ीत किया ।पंचमेश का व्यय  भाव में षष्ठेश  से युति करना  मस्तिष्क विकार की पुष्टि करता है।लग्नेश का राहु से पीड़ीत होकर षष्ठस्थ होना भी पागलपन को दर्शा रहा है ।
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प्रश्न के अनुसार मुझे रतोंधी रोग तो नहीं आंखो में

रतोंधी रोग जानने के योग ___
(1) शुक्र+चंद्रमा की युति त्रिक भाव में हो ।
(2) द्वितीयेश +द्वादशेश+चंद्रमा+शुक्र की युति लग्न में हो ।।
               
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Monday, March 9, 2020

प्रश्न के अनुसार रोगी की मृत्यु होगी या नहीं

2,7,12 भाव में पाप ग्रह हो तथा 1,6,8भाव में चंद्रमा हो या चंद्रमा पाप ग्रहों के मध्यतव मै हो तो इससे ऐसा जाने की रोगी की मृत्यु बहुत ही जल्दी होने वाली है ।

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हर्ष योग कैसे बनता है

षष्ठेश दु:स्थान में स्थित होने से हर्ष योग बनता है ।ऐसा जातक पराक्रमी ,धर्मभीरू ,धनी व यशस्वी होता है 

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Sunday, March 8, 2020

प्रश्न के अनुसार रोगी ठीक नहीं हो रहा तो डाक्टर बदले या ना बदले ।

रोग प्रश्न मै लग्न डाक्टर है तो चतुर्थ भाव ओषधि या रोग का इलाज है ।सप्तम भाव रोग को व दशम भाव रोगी के व्यवहार को दर्शाता है।

(1) लग्न में यदि चर राशि पाप ग्रह से दृष्टि युति करे तथा लग्नेश नीचस्थ शत्रुछेत्री या अन्य प्रकार हीन बली हो तो ऐसे योग में डाक्टर की योग्यता पर प्रश्न चिह्न लगता है ।डाक्टर के कारण रोगी ठीक नहीं हो रहा है अतः डाक्टर बदलने मै ही भलाई है ।

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Saturday, March 7, 2020

प्रश्न के अनुसार जातक हत्यारा कब बनता है

(1)सप्तम भाव से तीन क्रूर ग्रहों का दृष्टि युति सम्बन्ध तथा सप्तमेश का हीन बली होना जातक को हत्यारा बनता है ।
(2) सप्तमेश बुध पापक्रंत होकर षष्ठ या अष्टम भाव में पाप कर्तरी योग में हो ।

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चोर पकड़ा जाएगा या नहीं ____

(१) लग्नेश का इत्थशाल सप्तमेश से होने पर 
(२)चन्द्रमा व सप्तमेश सूर्य से समान दूरी पर हो 
(३) लग्न की सप्तम भाव पर दृष्टि नहीं हो तो चोर जरूर पकड़ा जाएगा ।।

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